Tuesday, December 29, 2015



सोचा ना था इतने आंसुओं के बाद भी कुछ बाकी रहेगा 

मगर ये कोने कोने में बसी यादे , जबरन उभर आती हैं , रोज की दौड  धूप में 
हाथ पकड के थाम लेती हैं 

कुछ यादे , कुछ पुराने ख्वाब… या बुरे सपने थे  
कुछ आंसू , कुछ भीनी सी मुस्कान … और कुछ अचम्भा … 

धीरे धीरे इन्हे भी सब सामान समेत , पिटारे में भर के , किसी छज्जे में रख छोडेंगे …. 
क्या पता कब निकालनी पडे 




struggled for many days to write this in english.. before realizing.. no matter how dusty and stumbling and incoherent, it will need hindi..