Saturday, May 21, 2011

Thought for the day

दिल की गिरह खोल दो चुप न बैठो कोई गीत गाओ
महफ़िल में अब कौन है अजनबी तुम मेरे पास आओ..

मिलने दो अब दिल से दिल को , मिटने दो मजबूरियों को
शीशे में अपने डुबो दो, सब फासलों दूरियों को
आँखों में मैं मुस्कुराओं तुम्हारी, जो तुम मुस्कुराओ..

महफ़िल में अब कौन है अजनबी..

हम तुम न हम तुम रहे अब, कुछ और ही हो गए अब
सपनों के झिलमिल नगर में, जाने कहाँ खो गए अब,
हमराह पूछे किसी से न तुम अपनी मंजिल बताओ..

महफ़िल में अब कौन है अजनबी..

कल हमसे पूछे न कोई, क्या हो गया था तुम्हे कल,
मुड़ कर नहीं देखते हम, दिल ने कहा है चला चल,
जो दूर पूछे कहीं रह गए अब उन्हें मत बुलाओ..

महफ़िल में अब कौन है अजनबी..

it just transports me right back to those days in school, those heartbreaks and make ups. Just seems like yesterday that we were dissecting the dynamics of possible relationships, over endless class breaks, between weekly tests, between moments sneaked from play rehearsals, in bunked classes hiding near the rooftop.

Seems just like yesterday, maybe it was. Because the more things change, the more they remain the same. And now, there are no more strangers, not in my mirror, not in hers.

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